पपरोला की 86 साल की बुजुर्ग ने दी कोरोना को मात, आप भी जानिए कैसे

पपरोला। (श्वेता शर्मा) कोरोना के बढ़ रहे मामलों के बीच कई बुजुर्ग लोग भी अपने हौंसले व हिम्मत से कोरोना को मात देकर उन लोगों के लिए एक बड़ा उदाहरण बन रहे हैं। जो कोरोना पॉजिटिव आने के बाद कई आशंकों को अपने मन में रखकर भयभीत हो रहे हैं। ऐसा ही एक मामला पपरोला में सामने आया है, यहां एक 86 वर्ष की बुजुर्ग महिला ने कोरोना को हाराया है। पपरोला से प्रसिद्ध पत्रकार जॉनी खान की माता सरस्वती बहल बताती हैं कि उनका जन्म 40 के दशक में अफगानिस्तान में हुआ था। पाकिस्तान व भारत के विभाजन के बाद वह अपने परिवार सहित भारत लौट आए और पपरोला में रहने लगे।

23 अप्रैल को उन्हें बुखार व सांस में दिक्कत आने की शिकायत के चलते बैजनाथ अस्पताल लाया गया। जहां जानकारी मिली कि वह कोरोना पॉजिटिव हैं। सरस्वती बहल बताती हैं कि जब वह छोटी थी, तो उन्होंने अपने परिजनों से स्पैनिश फ्लू की भी कई बातें सुनी हुई थी। कई बीमारियों का दौर देखा था। ऐसे में कोविड पॉजिटिव आने पर भी वह घबराई नहीं। उन्हें बैजनाथ से अकेले एंबुलेंस में धर्मशाला के लिए शिफ्ट किया गया। अस्पताल में काफी संख्या में मरीज थे। कई मरीज घबरा रहे थे और हौंसला छोड़ रहे थे।

शुरू में ऑक्सीजन को लेकर उन्हें भी कुछ शंकाय हुई। उन्होंने भी अपनी शिकायत प्रशासन के समक्ष रखी। लेकिन बाद में महामारी के इस दौर में डॉक्टर, नर्स व सफाई कर्मियों के जज्बे को देखकर वह खुद हैरान थी। कोरोना यौद्धाओं के जज्बे के साथ उन्होंने भी धर्मशाला अस्पताल पहुंच रहे कई मरीजों को हौंसला दिया। 16 दिन धर्मशाला व इसके बाद सात दिन पपरोला कोविड अस्पताल रहने के बाद सरस्वती बहल घर पहुंच गई हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना को अपने उपर हावी न होने दें। जो दवाईयां बताई हैं, उन्हें खाएं, खुश रहे और अपने दिमाग पर कोई डर पैदा न होने दें। अगर भूख नहीं भी हो, तो भी पानी और खाना लेते रहे। अाप अपना व्यवहार वैसे ही रखे जैसे कुछ नहीं हुआ है। उनके बेटे जॉनी खान ने बताया कि मां को चलने में भी दिक्कत होती हैं। बावजूद इसके उन्होंने अकेले अस्पताल में डर को हावी नहीं होने दिया और कोरोना को मात दी।

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